शेयर बाजार में दिखा अमेरिकी H-1B वीजा शुल्क का पहला झटका, प्रमुख आईटी कंपनियों के शेयर 2-6% तक गिरे

शेयर बाजार में दिखा अमेरिकी H-1B वीजा शुल्क का पहला झटका, प्रमुख आईटी कंपनियों के शेयर 2-6% तक गिरे

मुंबई। अमेरिका द्वारा नए एच-1बी वीजा आवेदन पर 100,000 डॉलर का शुल्क लगाने का फैसला भारतीय आईटी उद्योग के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है। अब तक यह शुल्क लगभग 2,000 से 5,000 डॉलर तक होता था, लेकिन अचानक यह खर्च कर्मचारियों के एक साल के वेतन के बराबर हो गया है। टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो जैसी भारतीय आईटी कंपनियों की अमेरिकी बाजार पर भारी निर्भरता है। ये कंपनियां सीधे तौर पर इसकी चपेट में आएंगी।

इन कंपनियों पर पड़ने वाले असर का प्रभाव आज सोमवार को शेयर बाजार में भी देखने को मिला, जब प्रमुख आईटी कंपनियों के शेयर 2-6% तक गिर गए। उल्लेखनीय है कि भारतीय आईटी कंपनियों की आमदनी का लगभग 55% हिस्सा अमेरिका से आता है, जबकि मिड-कैप कंपनियां जैसे एलटीआई माइंडट्री, एमफेसिस और पर्सिस्टेंट के लिए यह अनुपात और भी ज्यादा यानी 75से 80% के बीच होता है। ऐसे में नई फीस उनकी लागत संरचना को पूरी तरह से बदल सकती है।

मुनाफा मार्जिन पर 50 से 150 बेसिस पॉइंट का असर

कंपनियां अगर यह शुल्क चुकाने का फैसला करती हैं, तो उनके मुनाफे के मार्जिन पर 50 से 150 बेसिस पॉइंट तक का असर पड़ सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि इतनी ऊंची फीस एच-1बी वीजा को आर्थिक रूप से अव्यवहारिक बना देगी और कंपनियां इसके बजाय स्थानीय कर्मचारियों को नियुक्त करने, सबकॉन्ट्रैक्टिंग बढ़ाने और काम को कनाडा, लैटिन अमेरिका और भारत जैसे देशों में शिफ्ट करने पर जोर देंगी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब आईटी क्षेत्र पहले से ही कई चुनौतियों से जूझ रहा है।

वैश्विक स्तर पर कमजोर मांग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते उपयोग से राजस्व पर दबाव और अमेरिका के हायर एक्ट जैसे नियमों ने पहले ही कंपनियों की ग्रोथ धीमी कर दी है। अब यह नया शुल्क उन पर अतिरिक्त बोझ डाल देगा। यह शुल्क एक बार देना होगा और एच-1बी वीजा की सामान्य अवधि 3+3 साल होती है। इसका मतलब है कि कंपनियों को छह साल के लिए केवल एक बार यह लागत उठानी होगी।

पिछले एक दशक से कंपनियां कर रही थीं तैयारी

पिछले एक दशक से भारतीय आईटी कंपनियां लगातार इस तरह की संभावित चुनौतियों के लिए तैयारी कर रही थीं। डौनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही वीजा नीतियों को लेकर अनिश्चितता बनी रही, जिसके चलते कंपनियों ने अमेरिकी स्थानीय कर्मचारियों की भर्ती बढ़ाई और एच-1बी पर निर्भरता घटाई। अब कई बड़ी कंपनियों की अमेरिकी वर्कफोर्स का आधा से ज्यादा हिस्सा पहले से ही स्थानीय है। इसके अलावा, कंपनियों ने कनाडा और लैटिन अमेरिका जैसे देशों में नियर-शोर डिलीवरी सेंटर बनाने पर भी निवेश किया है, ताकि अमेरिकी ग्राहकों को समयानुसार सेवाएं दी जा सकें।

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दीर्घकाल में अवसर में बदल सकता है यह संकट

हालांकि, अल्पकालिक असर नकारात्मक रह सकता है। जिन सौदों की बातचीत चल रही है, वे इस अनिश्चितता के कारण टल सकते हैं या धीमे हो सकते हैं। फिर भी, बाजार विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय आईटी कंपनियों ने अतीत में भी इसी तरह की चुनौतियों का सामना किया है और वे इस बार भी संभल जाएंगी। सकारात्मक पहलू यह है कि कंपनियों के पास अभी 6 से 12 महीने का समय है, क्योंकि यह नया शुल्क सितंबर 2025 के बाद दाखिल होने वाले वीजा आवेदन पर लागू होगा। इसके अलावा, कई कंपनियों के पास पहले से अप्रयुक्त एच-1बी वीजा भी मौजूद हैं, जो उन्हें अल्पकाल में राहत देंगे।

साथ ही, इस फैसले को कानूनी चुनौती भी मिल सकती है, जिससे इसका असर और आगे खिसक सकता है। कुल मिलाकर, यह कदम भारतीय आईटी उद्योग के लिए अल्पकाल में नकारात्मक साबित होगा, लेकिन दीर्घकाल में कंपनियां अपनी रणनीतियों को एडजस्ट कर इस संकट को भी अवसर में बदल सकती हैं। इतिहास बताता है कि हर बार जब वीजा से जुड़ी कठिनाइयां आई हैं, भारतीय आईटी कंपनियों ने खुद को और ज्यादा प्रतिस्पर्धी और लचीला बनाया है। इस बार भी संभावना है कि ज्यादा ऑफशोरिंग और स्थानीय हायरिंग के सहारे उद्योग इस चुनौती को पार कर जाएगा।

Aniruddh Singh
By Aniruddh Singh

अनिरुद्ध प्रताप सिंह। नवंबर 2024 से पीपु...

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